'तिरंगा राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है तो खादी उस गौरव की आत्मा'
केवीआईसी के अध्यक्ष का खादी तिरंगे पर रोचक आलेख प्रस्तुतस्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
Wednesday 11 February 2026 01:53:52 PM
भुज (गुजरात)। इस वर्ष भारतीय गणतंत्र दिवस पर कच्छ के सफेद रण पर दुनिया के सबसे विशाल खादी तिरंगे का भव्य एवं दिव्य प्रदर्शन किया गया। कच्छ का सफेद रण, जहां धरती और आकाश मानो एकदूसरे में विलीन होते दिखाई देते हैं, वह केवल प्राकृतिक आश्चर्य का स्थल नहीं, बल्कि नए भारत के बदलते आत्मविश्वास का सजीव प्रतीक बन चुका है। खादी तिरंगे का प्रदर्शन केवल एक आयोजन नहीं था, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में स्वदेशी परंपरा, राष्ट्रीय संकल्प और समकालीन भारत की विकास दृष्टि की सशक्त सार्वजनिक अभिव्यक्ति थी। इस अद्भुत, अविश्वसनीय, अकल्पनीय दृश्य के साक्षी देश के कारीगर, सुरक्षा बलों के जवान और अनेक नागरिक बने। ये भी अपने आपमें नया कीर्तिमान बनाकि देशभर के लाखों खादी कारीगरों ने वीडियो संदेश से राष्ट्रीय ध्वज को सलामी देकर इतिहास रच दिया। यह क्षण इस बातको रेखांकित करता हैकि तिरंगा केवल कपड़े का विस्तार नहीं, बल्कि विचार का विस्तार है।
खादी, जिसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा कहा गया है, आज आत्मनिर्भर भारत की ऊर्जा के रूपमें पुनर्परिभाषित हो रही है। महात्मा गांधी का यह कथन ‘खादी भारत की आर्थिक स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का प्रतीक है’, समकालीन भारत में एक नए अर्थ केसाथ जीवंत दिखाई देती है। इस राष्ट्रीय पुनर्जागरण को समझना हो तो भुज की ओर देखना पर्याप्त है। विनाशकारी भूकंप ने कभी इस शहर को गहरे घाव दिए थे, किंतु संकट के उसी क्षण में एक दीर्घदर्शी दृष्टि ने पुनर्निर्माण को केवल आवश्यकता नहीं, अवसर के रूपमें देखा। तत्कालीन मुख्यमंत्री और आजके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में योजनाबद्ध शहरीकरण, सुदृढ़ अधोसंरचना और सामुदायिक पुनर्स्थापन से भुज का पुनर्जन्म हुआ। पुनर्निर्माण के 25 वर्ष बाद भुज केवल खड़ा नहीं है, वह आगे बढ़ रहा है, वह इस सत्य का प्रमाण हैकि जब नेतृत्व में स्पष्टता और संकल्प हो तो आपदा भी विकास की प्रस्तावना बन सकती है। भौगोलिक रूपसे सीमांत क्षेत्रमें होने के कारण भुज का महत्व औरभी बढ़ जाता है, यहां विकास और सुरक्षा परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एकदूसरे के पूरक हैं। भारतीय सैनिकों की उपस्थिति हमें याद दिलाती हैकि राष्ट्र की आर्थिक प्रगति उसकी सामरिक स्थिरता पर ही टिकती है।
ऑपरेशन सिंदूर की भावना से प्रेरित विश्व के सबसे विशाल प्रतीकात्मक खादी तिरंगे को दी गई सलामी वस्तुतः उन अनगिनत वीरों केप्रति राष्ट्र की सामूहिक कृतज्ञता है, जिनके त्याग से विकास की धारा निर्बाध बहती है। यदि तिरंगा राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है तो खादी उस गौरव की आत्मा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खादी को अतीत की स्मृति से निकालकर भविष्य की रणनीति का हिस्सा बनाया है, उनके शब्दों में ‘खादी केवल वस्त्र नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत का विचार और जन आंदोलन है।’ आज ग्राम स्वराज की अवधारणा व्यवहारिक अर्थशास्त्र में परिवर्तित होती दिखाई दे रही है। खादी और ग्रामोद्योग उत्पादों की बिक्री 1.70 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पारकर चुकी है और शीघ्र ही 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की ओर अग्रसर है। इससे भी अधिक उल्लेखनीय यह हैकि इस क्षेत्र ने 2 करोड़ से अधिक लोगों को रोज़गार प्रदान किया है, एक ऐसा परिवर्तन जो ग्रामीण भारत को केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि उत्पादक शक्ति के रूपमें स्थापित करता है।
भारत का विकास अब महानगरों तक सीमित नहीं, वह गांवों, कुटीर उद्योगों और पारंपरिक कारीगरों से व्यापक सामाजिक आधार प्राप्त कर रहा है। खादी कारीगरों का पारिश्रमिक 15 रुपये प्रति लच्छा तक पहुंच चुका है, इसे 20 रुपये प्रति लच्छा से आगे ले जानेका संकल्प इस बातका द्योतक हैकि आर्थिक विकास का वास्तविक अर्थ आय वृद्धि केसाथ सम्मान की स्थापना भी है। यह एक उभरते आर्टिजन युग का संकेत देती है, एक ऐसा कालखंड, जिसमें परंपरा और प्रौद्योगिकी मिलकर नई समृद्धि का निर्माण कर रहे हैं। डिजिटल युग में प्रतीकों की शक्ति औरभी बढ़ जाती है। #IconicKhadiTiranga का सोशल मीडिया पर 20 मिलियन से अधिक व्यूज़ प्राप्त करना केवल लोकप्रियता का संकेत नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का द्योतक है। विशेषकर Gen-Z का इस प्रतीक से जुड़ना बताता हैकि नई पीढ़ी वैश्विक आकांक्षाओं केसाथ-साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान कोभी उतनी ही दृढ़ता से स्वीकार करना चाहती है।
कच्छ के रण में आलोकित तिरंगा अंततः हमें एक व्यापक सत्य की ओर ले जाता हैकि राष्ट्र निर्माण किसी एक नीति, एक परियोजना या एक समयखंड का परिणाम नहीं होता, वह दृष्टि, निरंतरता और सामूहिक विश्वास से निर्मित होता है। जब विरासत को सम्मान मिलता है, जब विकास समावेशी होता है, जब सीमाएं सुरक्षित होती हैं और जब नेतृत्व भविष्य को देखने का साहस रखता है, तब परिवर्तन एक घटना नहीं, एक युग बन जाता है। भुज का पुनर्जागरण, खादी का पुनरुत्थान और ग्राम स्वराज की नई ऊर्जा मिलकर जिस भारत की रचना कर रहे हैं, वह संभावनाओं का नहीं, उपलब्धियों का भारत है, आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर और निर्णायक है। खादी और तिरंगे पर यह रोचकपूर्ण आलेख खादी और ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष मनोज कुमार ने प्रस्तुत किया है।