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प्राचीन बौद्ध स्थल सारनाथ विश्व धरोहर में दर्ज

बुसान में विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र में ऐतिहासिक फैसला

वैश्विक सम्मान पाने वाली यह भारत की 45वीं धरोहर बन गई है

स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम

Monday 27 July 2026 02:03:17 PM

sarnath an ancient buddhist site has been declared a world heritage site

बुसान/ नई दिल्ली। दक्षिण कोरिया के बुसान में हुए विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र में एक ऐतिहासिक फैसले केतहत 2025-26 चक्र केलिए भारत की आधिकारिक दावेदारी वाले सारनाथ के प्राचीन बौद्ध स्थल को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया गया। सम्मान पाने वाली यह भारत की 45वीं धरोहर बन गई है। यह वैश्विक सम्मान भारत की सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाता है और वास्तुकला की उत्कृष्टता, क्षेत्रीय पहचान और ऐतिहासिक निरंतरता की विविध परंपराओं को प्रदर्शित करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर भारत के लोगों को बधाई दी। इस धरोहर स्थल के दो भाग हैं-चौखंडी स्तूप और सारनाथ के पुरातात्विक अवशेष (धमेक स्तूप, धर्मराजिका स्तूप, मूलगंधकुटी विहार, अशोक स्तंभ आदि) जो उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हैं। ये दोनों हिस्से मिलकर सारनाथ के प्राचीन स्थल के वास्तुशिल्प और पुरातात्विक अवशेषों को संजोए हुए हैं।
बौद्ध परंपरा में इस स्थल को अलग-अलग नाम-ऋषिपत्तन, इषिपत्तन, मृगदाव से जाना जाता है। ये सभी नाम एक पवित्र स्थान की ओर इशारा करते हैं, जहां छठी शताब्दी ईसा पूर्व में बुद्ध आए थे और उन्होंने अपना पहला उपदेश दिया था, जिसे 'धर्म के पहिये का घूमना' (धर्मचक्र प्रवर्तन) कहा जाता है। इसी घटना से बौद्ध संघ की शुरुआत हुई और आर्य अष्टांगिक मार्ग के सिद्धांतों की स्थापना हुई। खुद भगवान बुद्ध ने सारनाथ को बौद्ध तीर्थयात्रा के चार मुख्य स्थलों में से एक बताया था। सदियों तक शाही, मठवासी और आम लोगों के संरक्षण में इसका विकास हुआ। गौतम बुद्ध ने जहां अपना पहला उपदेश दिया था और जहां वे अपने पहले शिष्यों से मिले थे उस जगह के आसपास कई स्तूप, मंदिर और विहार बनाए गए। बारहवीं सदी ईस्वी में पतन और उसके बाद हुई तबाही के कारण यह जगह गुमनामी में चली गई, जबतक कि 18वीं सदी में इसे फिरसे खोजा नहीं गया। इस जगह पर प्राचीन स्मारकों का एक समूह है, जो पूर्व मौर्यकाल (5वीं-4वीं सदी ईसा पूर्व से तीसरी सदी ईसा पूर्व) से 12वीं सदी ईस्वी में सारनाथ के विनाश तक बनाए गए थे (इसमें बादमें कुछ और चीजें भी जोड़ी गईं)। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने सारनाथ में बड़े पैमाने पर खुदाई की है, जिससे 16 सदियों (5वीं-4वीं सदी ईसा पूर्व से 12वीं सदी ईस्वी) तक फैली हुई अलग-अलग दौर की बस्तियों का पता चला है।
बौद्ध तीर्थयात्रा के चार सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से तीन-लुंबिनी (नेपाल), महाबोधि मंदिर, बोधगया (बिहार) और अब सारनाथ (उत्तर प्रदेश) विश्व धरोहर में शामिल हो गए हैं। कई और महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल भी इसमें शामिल हैं जैसे-सांची, नालंदा, अजंता (तीनों भारत में), अनुराधापुर (श्रीलंका), पहाड़पुर (बांग्लादेश), तक्षशिला और तख्त-ए-बाही (दोनों आजके पाकिस्तान में) आदि। गौरतलब हैकि सारनाथ प्राचीन स्थल को 1998 में विश्व धरोहर की संभावित सूची में शामिल किया गया था। यह प्रस्ताव जनवरी 2025 में विश्व धरोहर समिति के विचार केलिए भेजा गया था। सलाहकार संस्थाओं केसाथ कई तकनीकी बैठकों और आईसीओएमओएस के मिशन के माध्यम से स्थल का निरीक्षण करने जैसी 18 महीने लंबी और गहन प्रक्रिया केबाद दक्षिण कोरिया के बुसान में विश्व धरोहर समिति के सदस्यों ने यह ऐतिहासिक फैसला लिया है। समिति की बैठक के दौरान विश्व धरोहर समिति के 21 सदस्यों, सदस्य देशों, यूनेस्को सचिवालय, विश्व धरोहर केंद्र और यूनेस्को की सलाहकार संस्थाओं आईसीओएमओएस, आईयूसीएन, आईसीसीआरओएम ने इस मौके पर भारत के प्रतिनिधिमंडल को बधाई दी। सारनाथ के स्थायी आध्यात्मिक महत्व को मान्यता देते हुए प्राचीन बौद्ध स्थल सारनाथ को मानदंड (iii) और (vi) के अंतर्गत नामांकित किया गया है।
सीआर (iii) बौद्ध तीर्थयात्रा के चार मुख्य स्थलों में से एक है जैसाकि यहां सदियों के दौरान बनाई गईं और पुर्निमाण की गईं बड़ी संख्या में धार्मिक इमारतों और स्मारकों से पता चलता है। सीआर (vi) बुद्ध के जीवन की उन घटनाओं से सीधे जुड़ा है, जो बौद्ध समुदाय केलिए बहुत महत्वपूर्ण हैं जैसे-उनका पहला उपदेश और उनके पहले शिष्यों से मुलाकात। इनका महत्व और अर्थ सारनाथ में सदियों से निर्मित असंख्य इमारतों में निहित है, जो बुद्ध के संदेश, उनकी शिक्षाओं और त्रिरत्न की अवधारणा केप्रति एक प्रतिक्रिया हैं। यूनेस्को की सूची में इन स्थलों को शामिल करने का उद्देश्य 196 देशों में सांस्कृतिक, प्राकृतिक और मिश्रित संपत्तियों में पाए जानेवाले उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्यों पर आधारित साझा विरासत का संरक्षण और संवर्धन करना है। ज्ञातव्य हैकि भारत 2021-25 तक प्रतिष्ठित विश्व धरोहर समिति का सदस्य बना और जुलाई 2024 में नई दिल्ली में पहलीबार विश्व धरोहर समिति की बैठक की मेजबानी भी की। यह पहचान ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने केलिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण और प्रबंधन प्रयासों को भी रेखांकित करती है। करीब 150 से ज़्यादा साल से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण सारनाथ में प्राचीन बौद्ध स्थल की खुदाई और संरक्षण का काम कर रहा है। इसीके चलते सारनाथ की खोज हुई और इसकी पहचान उस जगह के तौरपर की गई, जहां शाक्यमुनि गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था।
सारनाथ में खुदाई में प्रसिद्ध मौर्यकालीन सिंह स्तंभ (जो बादमें भारत का राष्ट्रीय प्रतीक बना) और प्राचीन गुप्तकला की धर्मचक्रप्रवर्तन बुद्ध की प्रतिमा मिली थी। इन्हें अभी भारत के सबसे पुराने साइट म्यूज़ियम में रखा गया है, जिसे 1904 में स्थापित किया गया था। विश्व धरोहर का दर्जा मिलने से बौद्ध धर्म के जन्मस्थान के तौरपर भारत की पहचान और मज़बूत होगी, जापान, थाईलैंड, श्रीलंका, म्यांमार, कंबोडिया, वियतनाम, दक्षिण कोरिया, मंगोलिया देशों केसाथ सांस्कृतिक कूटनीति भी बेहतर होगी। यह पहचान अंतर्राष्ट्रीय जुड़ाव केलिए बौद्ध विरासत को बढ़ावा देने की भारत की कोशिशों को और मजबूत करेगी। यह विरासत संरक्षण में भारत की विशेषज्ञता और नामांकन प्रक्रिया केलिए उसकी तैयारी को भी दुनिया के सामने लाएगी। पिछले साल पेरिस में यूनेस्को मुख्यालय में हुई विश्व धरोहर समिति की 47वीं बैठक में 'भारत के मराठा मिलिट्री लैंडस्केप्स' को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था। इस सूची में 45 स्थलों केसाथ भारत दुनियाभर में छठे और एशिया पैसिफिक क्षेत्रमें दूसरे स्थान पर है, जहां सबसे ज़्यादा विश्व धरोहर स्थल हैं। 
भारत के 69 स्थल विश्व धरोहर की संभावित सूची में भी शामिल हैं, जिनका कि भविष्य में किसीभी स्थल को विश्व धरोहर स्थल के तौरपर माने जाने केलिए इस सूची में होना जरूरी है। हर साल हर देश विश्व धरोहर सूची में शामिल करने केलिए विश्व धरोहर समिति के विचारार्थ सिर्फ एक स्थल का प्रस्ताव दे सकता है। भारत सरकार की ओर से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) देश में विश्व विरासत से जुड़े सभी मामलों के लिए नोडल एजेंसी है। इस वैश्विक पहचान केसाथ भारत सारनाथ के असाधारण वैश्विक महत्व की रक्षा करने केलिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराता है। इसके लिए पर्यटन का टिकाऊ तरीके से प्रबंधन किया जाएगा और इस स्थल की प्रामाणिकता और अखंडता को बनाए रखने केलिए बफर ज़ोन में बिना योजना के होने वाले विकास को रोका जाएगा।

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