देहरादून परेड ग्राउंड में नौ दिनी दून पुस्तक महोत्सव का शुभारंभ
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने छात्रों को उपहारस्वरूप भेंट कीं पुस्तकेंस्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
Monday 6 April 2026 12:04:49 PM
देहरादून। दून पुस्तक महोत्सव 12 अप्रैल 2026 तक देहरादून परेड ग्राउंड में सभीको साहित्यिक और सांस्कृतिक उत्सव का हिस्सा बनने केलिए आमंत्रित करता है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दून पुस्तक महोत्सव का भव्य शुभारंभ मुख्य अतिथि के रूपमें किया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहाकि यह महोत्सव साहित्य, संस्कृति और कला का एक अद्भुत संगम है। उन्होंने उत्तराखंड को ज्ञान और संस्कृति की देवभूमि बताते हुए कहाकि महाकवि कालिदास ने 'अभिज्ञान शाकुंतलम्' की रचना इसी भूमि पर की थी। उन्होंने शैलेष मटियानी, लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ और रस्किन बॉंड जैसे साहित्यकारों के योगदान को याद किया और कहाकि पुस्तकें केवल शब्दों का संग्रह नहीं हैं, बल्कि ये पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान को जीवित रखती हैं और हमें सोचने समझने की शक्ति प्रदान करती हैं। मुख्यमंत्री ने आह्वान कियाकि पुस्तकें खरीदकर पढ़ने से न केवल व्यक्ति का ज्ञान बढ़ता है, बल्कि इससे प्रकाशकों और ज्ञान की समृद्ध परंपरा को भी मजबूती मिलती है।
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, शिक्षा मंत्रालय और उत्तराखंड सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित नौ दिवसीय दून पुस्तक महोत्सव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की प्रकाशित गढ़वाली-कुमाउनी भाषा की पुस्तकों का लोकार्पण किया। गढ़वाली में अनूदित पुस्तकें जैसे-चौरी-चौरा जनक्रांति को नयो सबेरो, नन्ना हैरा चखुला, उम्मीदै किरण, गैरा सागरा अजूबा, आदमी अर छैल अर हौरी कहानि आदि और कुमाउनी भाषा में अनूदित पुस्तकें जैसे-माटि म्यर देशे कि, अभिमानै हार, बढ़नै जाणी कान, खाटू श्यामक अणसुणि कहाणि, गुलाब क दगड़ू आदि कुल 26 पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। दून पुस्तक महोत्सव में मुख्यमंत्री और अतिथियों ने बाल मंडप और इंटरेक्टिव लर्निंग कॉर्नर का निरीक्षण किया, पेंटिंग गतिविधियों में प्रतिभाग करने वाले बच्चों से बातचीत की। उत्कृष्ट कला प्रदर्शन करने वाले बच्चों को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उपहारस्वरूप पुस्तकें 'एग्जाम वॉरियर्स एवं चंद्रयान' भेंट कीं।
इस अवसर पर आचार्य बालकृष्ण, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास भारत के अध्यक्ष प्रोफेसर मिलिंद सुधाकर मराठे, उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री खजान दास, देहरादून के महापौर सौरभ थपलियाल, न्यास के निदेशक युवराज मलिक, देवभूमि विश्वविद्यालय के उपाध्यक्ष अमन बंसल, छात्र-छात्राएं और बड़ी संख्या में पुस्तकप्रेमी उपस्थित थे। आचार्य बालकृष्ण ने पुस्तकों के महत्व पर कहाकि यह महोत्सव केवल एक मेला नहीं, बल्कि ज्ञान और संस्कृति के आदान प्रदान का मंच है। उन्होंने आधुनिक तकनीक पर टिप्पणी करते हुए कहाकि एआई अपने आपमें चैतन्य चीज नहीं है, वह केवल डेटा सर्च करने का काम करता है, अतः वास्तविक सूचना और ज्ञान केलिए मूल लेखकों को पढ़ना जरूरी है। युवराज मलिक ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का आभार व्यक्त करते हुए कहाकि उत्तराखंड राज्य की स्थापना के 26 वर्ष बाद पहलीबार आध्यात्म के इस बड़े केंद्र में साहित्य, कला और संस्कृति का ऐसा अनूठा संगम हो रहा है। उन्होंने भरोसा दिलायाकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के रोडमैप के अनुसार यह देश का सर्वोत्तम पुस्तक मेला बनेगा और उत्तराखंड साहित्य के मानचित्र पर वैश्विक स्तर पर चमकेगा।
दून पुस्तक महोत्सव का एक प्रमुख आकर्षण ‘दून लिट फेस्ट’ है, जहां नितिन सेठ, कुलप्रीत यादव, अखिलेंद्र मिश्रा, आचार्य प्रशांत, शुभांशु शुक्ला और लेफ्टिनेंट जनरल सतीश दुआ जैसे प्रतिष्ठित लेखक, फिल्मकार, चिंतक और सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तित्व विभिन्न विषयों पर संवाद में भाग लेंगे। दून पुस्तक महोत्सव में प्रतिदिन कहानी सत्र, रचनात्मक कार्यशालाएं, बच्चों केलिए क्विज़ और प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी, शिक्षकों केलिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम भी होंगे। शाम के समय पांडवाज, नरेंद्र सिंह नेगी, ‘कलर्स ऑफ इंडिया’ और वंशिका जोशी जैसे प्रसिद्ध कलाकारों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और संगीत कार्यक्रम माहौल को उत्सवमय बनाएंगे। महोत्सव राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय के माध्यम से डिजिटल पठन को भी बढ़ावा देगा, जिसमें 22 से अधिक भारतीय भाषाओं और अंग्रेज़ी में हजारों पुस्तकें निःशुल्क उपलब्ध हैं। प्रोफेसर मिलिंद सुधाकर मराठे ने उत्तराखंड को भारतीय संस्कृति एवं वीरता का संगम बताया और कहाकि जिस तरह शरीर केलिए व्यायाम जरूरी है, वैसेही मन केलिए पुस्तकों का वाचन अनिवार्य है। उन्होंने वेदव्यास, महर्षि कण्व, सुंदरलाल बहुगुणा और बछेंद्री पाल जैसी विभूतियों का जिक्र करते हुए देवभूमि उत्तराखंड की बौद्धिक उर्वरता को रेखांकित किया। उन्होंने इस दौरान कवि सुमित्रानंदन पंत की कविता 'मैं सबसे छोटी होऊँ' की पंक्तियां पढ़ते हुए उनकी साहित्यिक विरासत का उल्लेख किया। ऐसे ही कई वक्ताओं ने पुस्तकों पर अपने वृहद ज्ञान का आदान प्रदान किया।